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Rani Lakshmi Bai Biography in Hindi, Essay, History of Rani Lakshmi Bai

Rani Lakshmi Bai Biography in Hindi

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का इतिहासझांसी की रानी का जीवन परिचय

रानी लक्ष्मीबाई संक्षिप्त जीवन परिचय
Rani Laxmi Bai Brief Biography in Hindi, About Rani Laxmi Bai
नाम मणिकर्णिका ताम्बे [ विवाह के पश्चात् लक्ष्मीबाई नेवलेकर ]
उपनाम मनु बाई
जन्म व स्थान सन 1828 ,काशी
मृत्यु सन 1858 [ 29 वर्ष ]
पिता मोरोपंत ताम्बे
माता भागीरथी बाई
विवाह तिथि 19 मई 1842
पति झाँसी नरेश महाराज गंगाधर रावनेवलेकर
संतान दामोदर राव, आनंद राव [ दत्तक पुत्र ]
घराना मराठा साम्राज्य
उल्लेखनीय कार्य सन 1857 का स्वतंत्रता संग्राम
धार्मिक मान्यता हिन्दू
जाति मराठी ब्राह्मण
राज्य झांसी
शौक घुड़सवारी करना, तीरंदाजी
जाति मराठी ब्राह्मण
मृत्यु स्थल कोटा की सराय, ग्वालियर, मध्य प्रदेश, भारत

रानी लक्ष्मी बाई का प्रारंभिक जीवन (Rani Laxmi Bai Information)

रानी लक्ष्मी बाई आजादी के लिए भारत के पहले संघर्ष के प्रमुख योद्धाओं में से एक थी । बहादुरी, देशभक्ति और सम्मान का प्रतीक, रानी लक्ष्मी बाई का जन्म 19 नवंबर 1828 को वाराणसी जिले के भदैनी नमक नगर में हुआ था। उसका असली नाम माणिकर्णिका था | परन्तु प्यार से उसे मनु कहा जाता था। उनके पिता मोरोपंत तांबे एक अदालत के सलाहकार थे, और मां भागीरथीबाई एक विद्वान महिला थीं। बहुत कम उम्र में ही मनु ने अपनी मां को खो दिया।

मोरोपंत एक मराठी थे और मराठा बाजीराव की सेवा में थे। मनु के माँ की मृत्यु के बाद घर में मनु की देखभाल के लिये कोई नही था इसलिये मनु के पिता उसे अपने साथ पेशवा के दरबार में ले जाने लगे | जहा चंचल एवं सुन्दर मनु ने सबका मन मोह लिया और लोग उसे प्यार से “छबीली” कहने लगे ।Rani Lakshmi Bai Biography in Hindi, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का इतिहास

मनु ने अपनी प्राथमिक शिक्षा घर से ही पूरी की जिसमे शास्त्रों की शिक्षा के साथ साथ शस्त्रों की शिक्षा (तीरंदाजी, तलवारबाजी, निशानेबाजी, घुड़सवारी और युद्धाभ्यास) भी प्राप्त की |उन्हें अपनी उम्र की बालिकाओं की अपेक्षा अधिक स्वतंत्रता (Freedom) प्राप्त थी|

मनु ने अपनी शिक्षा(Education) नानासाहेब और तात्या टोपे के साथ ही प्राप्त की और उन्ही के साथ ही मनु का बचपन भी बीता, नानासाहेब और तात्या टोपे आजादी के पहले विद्रोह में सक्रिय प्रतिभागी थे। मनु साहसिक कार्यों के साथ – साथ धार्मिक कार्यों में भी काफी रुचि रखती थीं |

रानी लक्ष्मी बाई का विवाह  (Marriage of Rani Lakshmi Bai)

1842 में, रानी लक्ष्मी बाई ने राजा गंगाधर राव से विवाह किया जो झांसी के महाराजा थे। तब मनु की उम्र मात्र १४ वर्ष थी, राजा गंगाधर राव से के शादी बाद, उन्हें लक्ष्मी बाई के नाम से जाना जाने लगा।

1851 में, उन्होंने एक बेटे को जन्म दिया जिसका नाम दामोदर राव रखा गया था लेकिन दुर्भाग्य से वह चार माह की उम्र में ही मर गया। उधर गंगाधर राव का स्वास्थ्य बिगड़ता जा रहा था। स्वास्थ्य बहुत अधिक बिगड़ जाने पर उन्हें दत्तक पुत्र लेने की सलाह दी गयी।

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महाराजा ने वैसा ही किया, एक पुत्र को दत्तक ले लिया। जो गंगाधर राव के ही भाई का बेटा था। बाद में उस दत्तक लिए हुए बेटे का नाम बदलकर महाराजा की मृत्यु से पहले दामोदर राव रखा गया । 21 नवंबर 1853 को महाराजा गंगाधर राव की मृत्यु (Death) हो गई | जब महाराजा की मृत्यु हुई,  तब रानी लक्ष्मी बाई की उम्र सिर्फ अठारह वर्ष थीं, लेकिन उन्होंने अपनी हिम्मत नहीं खोई और बालक दामोदर की आयु कम होने के कारण राज्य – काज का उत्तरदायित्व महारानी लक्ष्मीबाई ने स्वयं पर ले लिया|

अंग्रेजी हुकूमत से संघर्ष में महारानी लक्ष्मी बाई की भूमिका (Role of Maharani Laxmi Bai in the Struggle with English Rule)

अंग्रेजो की  हुकुमत से संघर्ष करने  के लिए रानी लक्ष्मीबाई ने  स्वयं सेना का गठन  आरम्भ  किया  था । इस सेना में महिलाओं की भर्ती की गयी  थी और उन्हें युद्ध में जीतने का प्रशिक्षण दिया गया था । झाँसी के रहने वाले लोगो ने भी इस संघर्ष में  रानी का साथ दिया था ।

अंग्रेजों के खिलाफ रानी लक्ष्मीबाई की जंग में और अंग्रेजी हड़प नीति के शिकार राजाओं जैसे बेगम हजरत महल,सम्राट की बेगम जीनत महल, स्वयं मुगल सम्राट बहादुर शाह, नाना साहब के वकील अजीमुल्ला शाहगढ़ के राजा, और तात्या टोपे आदि सभी महारानी के इस संघर्ष में सहयोग देने  के लिए आगे आये और इस तरह सब ने मिलकर अंग्रेजो की हुकूमत से  संघर्ष  किया और जीत की ओर अगर बढे |उस समय भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौसी, एक बहुत ही चतुर व्यक्ति था जिसने ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार करने के लिए झांसी की दुर्भाग्य का लाभ उठाने का प्रयास किया था। ब्रिटिश शासकों ने महाराजा गंगाधर राव और रानी लक्ष्मी बाई के कानूनी वारिस के रूप में दामोदर राव को स्वीकार नहीं किया था।

नाना साहब की लक्ष्मी बाई को चुनौती (Challenge of Nana Saheb’s Lakshmi Bai)

रानी लक्ष्मी बाई बहादुर तो  बचपन से ही थी। वे बड़ी से बड़ी चुनौतियां का सामना  बड़ी समझदारी और होशयारी से करती थी  ऐसे ही एक बार जब वे घुड़सवारी कर रही थी तब नाना साहब ने मनु बाई से कहा कि अगर हिम्मत है तो मेरे घोड़े से आगे निकल कर दिखाओ|  मनु बाई ने नानासाहब की ये चुनौती मुस्कराते हुए स्वीकार कर ली और  फिर नानासाहब के साथ घुड़सवारी के लिए निकल पड़ी ।

जहां नानासाहब का घोड़ा तेज गति से दौड रहा था वहीं लक्ष्मी बाई का घोड़ा उनसे पीछे नहीं रहा, इस दौरान नानासाहब ने लक्ष्मी बाई सेआगे निकलने की कोशिश की लेकिन वे असफल रहे और इस  दौड़ में वे घोड़े से नीचे गिर गए और फिर नाना साहब चिल्ला पड़े  ” मनु मै मरा ” जैसे ही मनु ने नाना साहब की आवाज सुनी वैसे ही मनु ने अपना घोड़े  को पीछे मोड़ लिया और नाना साहब को अपने घोड़े में बैठकर अपने घर की तरफ चल पड़ी।इसके बाद ने मनु को शाबासी दी और साथ ही उनकी घुड़सवारी की  तारीफ भी  की और कहा कि मनु तुम घोड़ा बहुत तेज दौड़ाती हो तुमने तो कमाल ही कर दिया। इस तरह रानी लक्ष्मी बाई ने नाना साहब की चुनौती की जीत हासिल की |इसके बाद नानासाहब और रावसाहब ने मनु की प्रतिभा को देखते हुए मनु को शस्त्र विद्या भी सिखाई। मनु ने नानासाहब से तलवार चलाना, भाला-बरछा फैकना और बंदूक से निशाना लगाना भी सीखा वही कुश्ती और मलखंभ उनके प्रिय व्यायाम थे।

कानपुर के नाना की मुँहबोली, बहन छबीली थी,
लक्ष्मी बाई नाम , पिता की वह संतान अकेली  थी,
नाना के संग पढ़ती थी, वह नाना के संग खेली थी,
बरछी ढाल ,कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी ,वह तो झांसी वाली रानी थी……!!

रानी लक्ष्मी बाई की मृत्यु (Rani Lakshmi Bai Death)

17 जून 1858 में किंग्स रॉयल आयरिश के खिलाफ युद्ध लड़ते समय उन्होंने ग्वालियर के पूर्व क्षेत्र  का मोर्चा  संभाला लक्ष्मी बाई पुरुष की पोशाक धारण किये हुए वीरता से युद्ध में  लड़ रही  थी युद्ध के दौरान वे अपने नए घोड़े ‘राजरतन ‘ पर सवार थी क्योकि उनका नया घोड़ा कूद नहीं पा रहा था और वे घोड़े से नीचे गिर चुकी थी |

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वीरता के साथ युद्ध करते -करते वे बहुत ही बुरी तरह से घायल हो चुकी थी परन्तु अंग्रेजी सैनिक उन्हें पहचान नहीं पाए थे क्योकि वे पुरुष पोशाक में थी फिर रानी के विश्वास पात्र सैनिक उन्हें पास के गंगादास मठ में ले गए और उन्हें जलपान कराया तब रानी ने अपनी अंतिम इच्छा बताई ” कोई भीं अंग्रेज अफसर उनकी मृत देह को  हाथ न लगाए ”इस प्रकार कोटा की सराई के पास ग्वालियर के फूलबाग क्षेत्र में अपने अंतिम वचनो को  बोलते हुए वे वीरगति  को प्राप्त हुई इस तरह देश को आजादी दिलाने में उन्होंने अपनी जान न्योछावर कर दी |

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One comment

  1. Rani Lakshmi Bai nice and historical Biography

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